Movie spotlight
हाल ही में स्पॉटलाइट को बेस्ट पिक्चर का एकेडमी अवार्ड मिला। अखबारों में इसके बारे में काफी कुछ छपा तो जिज्ञासा पैदा हुई। खोज का फिल्म निकाली और देख गया। फिल्म निर्मल आनंद, खासकर मेरे लिए। पत्रकारिता की दुनिया से राब्ता रखने वालों को जरूर देखनी चाहिए। रोज अठ्ठारह पेज की रद्दी छापने वालों के लिए विशेष सुझाव है कि ये फिल्म देखें। इंवेस्टिगेटिव स्टोरी का रोमांच और उससे भी ज्यादा समाज के प्रति जवाबदेही। इस फिल्म में कोई नायक नहीं है, नायिका भी नहीं, बस किरदार हैं। ढेर सारे किरदार अपने अपने सच और अपने अपने झूठ के साथ। स्पॉटलाइट अपने सामने खड़े होकर अपनी आंखों में देखकर सच कहने का साहस है। इस फिल्म में एडीटर वैसा ही है जैसा होना चाहिए और रिपोर्टर भी वैसा ही जैसा होना चाहिए। हीरोइज्म जैसी किसी परीकथा से दूर इस कहानी में खुद कहानी ही नायक है और खलनायक भी। हैप्पी एंडिंग से लगाव रखने वाले दर्शक इससे दूरी बनाए रखें क्योंकि फिल्म सिर्फ वही सच बताती है जैसा इस दुनिया में घटित होता है।
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